आम-सी दिखने वाली ख़ास चीज़ों का म्यूजियम

शादीपुर मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 5 से निकल कर आप अगर आसपास के इलाके पर नज़र डालें तो आप इस निष्कर्ष पर कभी नहीं पहुंचेंगे कि मेट्रो स्टेशन से 5 मिनट की दूरी पर रणजीत नगर में एक बुकस्टोर होगा. ऐसी ढ़ेरों कल्पनाएं मुख्यधारा द्वारा परिभाषित की गयी समाज की रूपरेखा के इर्द-गिर्द बुनी होती हैं. कौन सी चीज़ किस इलाके में होगी, उस चीज़ के होने के लिए उस इलाके का सोशल बैकग्राउंड क्या होना चाहिए, ऐसी सारी बेमानी बातें न सिर्फ प्रचलन में हैं बल्कि हम उन्हें दैनिक रूप से साथ लेकर भी चल रहे होते हैं. ऐसे में निम्न मध्यम वर्गीय इलाके में एक बुकस्टोर का होना आपको चौंकाता है. आप हैरान रह जाते हैं क्यूंकि यह आपकी अपेक्षा के बाहर का अनुभव होता है. मेडे बुकस्टोर ऐसे ही अनुभवों से आपको रूबरू कराता है.

मेडे बुकस्टोर के बगल में एक परफॉरमेंस स्पेस है- स्टूडियो सफ़दर के नाम से. जगह का अपना इतिहास है. शहर के वो समूह जो श्री-राम सेंटर, कमानी ऑडिटोरियम जैसे स्पेसेस की आसमान छूती कीमतें देने में समर्थ नहीं हैं, उनके लिए अपनी कला दिखाने का एक अहम आसरा स्टूडियो सफ़दर है. नाटक-मंचन के अलावा फिल्म स्क्रीनिंग, नाट्य-मंचन, पब्लिक टॉक्स, lectures जैसे इवेंट्स यहाँ अमूमन होते रहते हैं.

स्टूडियो सफ़दर में इन दिनों एक अनूठे तरह का म्यूजियम लगा है- म्यूजियम ऑफ़ आर्डिनरी ऑब्जेक्ट्स (आम चीज़ों का संग्रहालय). जब भी हम ‘म्यूजियम’ शब्द सुनते हैं या कहीं पढ़ते हैं तो इसको एक ख़ास वर्ग के साथ जोड़ते हैं. म्यूजियम में प्रदर्शित की जाने वाली चीज़ों के साथ भी ऐसी ही ‘खासियत’ का भाव जुड़ा है; पुरानी, अनोखी, कोई राजा-महाराजा की तलवार, कोई ऐसी वस्तु जिसके कण-कण से पुरालेख टपक रहा हो. ऐसे ठप्पे की वजह ये है कि म्यूजियम सच में एक वर्ग विशेष के मनोरंजन का साधन बन कर सीमित हो गया है. यह सिर्फ संग्रहित होने वाली वस्तुओं की वजह से नहीं है. एक कारण लोकेशन भी है. ‘आम चीज़ों का म्यूजियम’ अपने मूल में इन सभी ठप्पों से आगे जाता है. वस्तुओं का चुनाव, उन्हें प्रदर्शित करने का ढंग, ये सारे फैक्टर इसे एक वर्ग विशेष की सीमा से पार ले जाते हैं.

ऐसा म्यूजियम पहली बार 2016 में मुंबई में लगा था. इस प्रयोग के पीछे टीम आर्ट्स ट्रस्ट है जिसने हरकत स्टूडियोज और एक्सटेंशन आर्ट्स के सहयोग से इस अनोखे विचार को हकीकत में बदला है.

इस म्यूजियम में करीब 300 चीज़ें रखी गयी है. लगभग चीज़ें शादीपुर इलाके के लोगों ने दान की हैं. म्यूजियम के वालंटियर्स 2 हफ्ते के अंतराल में स्टूडियो सफ़दर के इर्दगिर्द के इलाके के सभी घरों में गये, लोगों को संकल्पना से अवगत कराया, और म्यूजियम के लिए चीज़ें मांगी. दान देने वालों में महिलाओं और बच्चों की संख्या पुरुषों की मात्रा में कहीं अधिक रही. अधिकतर चीज़ें 1 से लेकर 10 साल पुरानी हैं लेकिन कुछ चीज़ें है जिन्हें देख कर लगता है जैसे इन्हें सालों से संजो कर रखा गया हो और अब एक कहानी के साथ म्यूजियम में आने वालों के अनुभवों के सुपुर्द कर दिया गया हो.

बाइक की पहली चाबी, एक जूता जिससे दानकर्ता को उसके नाना जी पीटा करते थे (जिस मार के कारण वह सुधर गया), कोई पुराना चश्मा, कोई एक कैंची, एक तवा, लैदर और टेनिस की गेंदें, ऐसी कई चीज़ें आप इस म्यूजियम में देख सकते हैं. हर चीज़ के साथ उसकी उत्पति का साल और एक कहानी जुडी है. ऐसी कहानियाँ ही देखने वालों को इन चीज़ों के साथ एक ऊपरी सतह से आगे जाकर एक अंदरूनी जुड़ाव महसूस करवाती हैं.

राजा-महाराजा की तलवार से आप जुड़ाव महसूस शायद ही कर पाएं लेकिन केमिस्ट्री का एक exam पेपर जिसमें दानकर्ता के 20 में से 4 नम्बर आये हैं, एक खिलौना जिसके साथ किसी का बचपन बीता है, कुछ दिन पहले ख़रीदा गया रजिस्टर, एक ड्राइंग बुक, कोई चम्मच, ये सारी ‘आम’ सी लगने वाली ऐसी ख़ास चीज़ें है जिनको छूते ही एक त्वरित तौर पर जुड़ाव महसूस होता है. चीज़ का स्पर्श पाकर आप अपनी दुनिया में खो जाते हैं और उस के साथ जुडी कहानी की डोर पकड़ कर यादों से अपनी एक कहानी निकाल लेते हैं.

जिन वस्तुओं के आगे लाल निशान बना हुआ है, वह सिर्फ देखने के उद्देश्य से रखी गयी है. जिनके आगे हरा निशान बना हुआ है, वह ख़ास किस्म की वस्तुएँ हैं. अगर आपको हरे निशान वाली कोई वस्तु पसंद आती है तो आप उसे ले जा सकते हैं बशर्ते उसकी जगह अपनी कोई वस्तु एक कहानी के साथ उस जगह छोड़ जाएँ. 23 सितबर से शुरू हुआ यह म्यूजियम 30 सितम्बर तक स्टूडियो सफ़दर में रहेगा. वक़्त निकालिए और जाइए, इस शहर में ख़ास लोगों को लिए ख़ास चीज़ें रोज़ होती रहती हैं. आम लोगों की आम चीज़ों को ख़ास ढंग से पेश करता ऐसा म्यूजियम बार-बार नहीं देख पायेंगे.

One thought on “आम-सी दिखने वाली ख़ास चीज़ों का म्यूजियम

  1. Innovative ideas converged on the wings to fly over all the people close to the earth!

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