भारतीय समाज और राजनीति को जिन घटनाओं ने सबसे ज्यादा बदला, उनमें मंडल कमीशन की रिपोर्ट का स्थान बहुत ऊपर है. भारत में आज़ादी के बाद के इतिहास को ‘मंडल कमीशन के पहले का भारत’ और ‘मंडल कमीशन के बाद का भारत’ जैसे कालखंडों में बांटा जा सकता है. यह आश्चर्यजनक है कि जिस रिपोर्ट का इतना असर है, उसे बहुत कम लोगों ने पढ़ा है. यह रिपोर्ट सरकारी दफ्तरों में सिमटकर रह गई. इस रिपोर्ट का सरकार ने हिंदी में अनुवाद तो कराया, लेकिन उसकी भाषा इतनी सरकारी और कठिन है, कि उसे पढ़ना और समझना मुश्किल है. लेफ्टवर्ड बुक्स द्वारा प्रकाशित किताब ‘मंडल कमीशन’ उस कमी को पूरा करने की कोशिश है. इस किताब के लिए ‘मंडल कमीशन’ की रिपोर्ट का हिंदी में अनुवाद सत्येन्द्र पीएस ने किया है. सत्येन्द्र पीएस ने किताब की भूमिका भी लिखी है. प्रस्तावना जस्टिस पी.बी. सावंत ने लिखी है. नीचे पेश है सत्येन्द्र पीएस की भूमिका का एक अंश जिसमें वो आरक्षण के प्रावधान के कारणों पर बात कर रहे हैं.

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सदियों से चले जातीय आरक्षण के चक्र को तोड़ने के लिए संविधान द्वारा दिया जा रहा मौजूदा आरक्षण देश के हित में है. देश का विकास इसमें निहित है कि विकास में हर कोई योगदान दे सके. पहले के आरक्षण में मंदिर में पूजा करना सिर्फ एक जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया. उस जाति के अलावा मंदिर में दूसरी जाति के लोग पुजारी नहीं हो सकते थे. कल्पना करें कि अगर 100 प्रतिशत आबादी में से पुजारी छांटे जाते, जातीय आधार पर पुजारी आरक्षित नहीं होता तो शायद बेहतर पुजारी निकलकर सामने आते. अगर टैलेंटेड लोग सामने आते तो पूजा पाठ का तरीका भी कुछ बदलता. या ईश्वर के बारे में ही कुछ बेहतर बताया जा सकता, कुछ ठोस, तार्किक और शोध आधारित जानकारी दी जा सकती. लेकिन ऐसा नहीं हो सका. जिन लोगों ने मंदिरों पर कब्ज़ा रखा है, वह सिर्फ उनके जीवन यापन का जरिया है, जिससे उनका यथासंभव बेहतरीन तरीके से भरण पोषण हो सके.

आधुनिक शिक्षा व्यवस्था और शोध संस्थानों में एक ही जाति का 80 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा है. वही एक जाति टेस्ट लेती है, चयन करती है और नियुक्ति करती है. दिलचस्प है कि विश्वविधालय, शोध संस्थानों आदि महत्वपूर्ण जगहों पर उस जाति विशेष को एक ही जाति में योग्य लोग मिलते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी योग्यता ट्रान्सफर होते हुए उनका शोध संस्थानों व विश्वविधालयों पर कब्ज़ा बना हुआ है. कब्जे का परिणाम क्या हुआ? देश का कोई भी विश्वविधालय वैश्विक मानकों पर खरा नहीं उतरता. यहाँ के शोध पत्र इतने स्तरहीन है कि पूरी दुनिया में उसे कहीं नहीं पुछा जाता है. इतना ही नहीं, जनोपयोगी चीज़ों पर शोध के मामले में भारत फिसड्डी है. आप अपने घर में जितनी भी चीज़ों का इस्तेमाल करते हैं, मोबाइल, कंप्यूटर, इन्टरनेट से लेकर रेफ्रीजिरेटर, माइक्रोवेव ओवन और वाशिंग मशीन तक, सब कुछ विदेश में आविष्कार किया हुआ है. हमारे शोध संस्थानों ने एक का भी शोध नहीं किया है. हमारे लड़ाकू विमान हमारे देश के नहीं हैं. वे फ्रांस, अमेरिका, रूस से आते हैं. कुछ मामलों में पूरा का पूरा लड़ाकू विमान ही आयात कर लिया जाता है. कुछ मामलों में उसके पुर्जे आयात होते हैं, जिसे हमारे महान वैज्ञानिक लोग असेंबल कर उड़ा देते हैं. हमारी ट्रेन की रफ़्तार अभी अधिकतम 140-160 किलोमीटर के बीच झूल रही है. वहीँ चीन, जापान से लेकर फ्रांस और जर्मनी तक की ट्रेनें रफ़्तार के नित नए कीर्तिमान बना रही है. ऐसे में हम देखें तो शोध संस्थानों और विश्वविधालयों पर एक जाति के कब्जे ने पूरे तंत्र का विनाश कर दिया है. हमें भिखारी बना दिया गया है. हाथ में मौजूद मोबाइल से लेकर युद्धक विमान तक हम भीख पर निर्भर हैं. किसी दुसरे देश की भीख पर. हम उनसे मांगते हैं. उनसे खरीदते हैं. लेकिन हमारे पास अपना नहीं है. अपना इसलिए नहीं है क्यूंकि हम शोध नहीं कर पाए. शोध इसलिए नहीं हुआ क्यूंकि हमारे देश में सिर्फ मामूली आबादी वाली एक जाति के भीतर योग्यता ढूंढी जाती रही और उसी को पठन पाठन और शोध की अनुमति दी गई. इन लोगों ने शोध के नाम पर शोध केन्द्रों को अपने रोज़गार का केंद्र बना लिया. अपने परिजनों, रिश्तेदारों को उसमें घुसाते रहे और पूरे शोध व शिक्षण संस्थानों में इनकी खुली लूट चलती रही.

अगर उस जाति विशेष, जिसकी आबादी महज 3.5 प्रतिशत है, उसमें भी सिर्फ पुरुष इनके अलावा शेष में से भी योग्य लोग चुने जाते तो? कुछ बेहतर की उम्मीद तो की जा सकती है. ज्यादातर विकशित देशों में शिक्षण संस्थान एक जाति के लिए सदियों से आरक्षित नहीं हैं, इसलिए उन देशों में 100 प्रतिशत आबादी में से प्रतिभाएं चुनी जाती हैं और उन प्रतिभाओं के शोध के बेहतर परिणाम आते हैं.

आरक्षण या आरक्षित वर्ग से आने वाले डॉक्टर, वकील, इंजिनियर, जज, प्रशासनिक अधिकारी आदि अपने अनारक्षित वर्ग के समकक्षों से कहीं बेहतर संवेदनशील और मानवीय गुणों वाले होते हैं. आरक्षण किसी भी संस्थान में प्रवेश दिला देता है लेकिन उसके बाद ब्राह्मणवादी तंत्र, जिसके कब्जे में हर संस्थान है वह तंत्र आरक्षित सीट/वर्ग से आने वालों को हर तरह से हतोत्साहित करता है. एक जैसे परफॉरमेंस देने के बावजूद दलित/पिछड़े को अंडर रेट करता है, मानसिक, शारीरिक, सामाजिक मनोवैज्ञानिक यानि हर तरह का शोषण करता है. फिर इतनी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद कोई आगे बढ़ता है तो उसमें सहनशक्ति, विपरीत परिस्थितियों में निर्णय ले पाने की बेहतर क्षमता, गलत और सही की बेहतर परख, संघर्ष से पैदा हुई जीवटता कूट कूट कर भरी होती है. इसलिए यह प्रचारित करना कि आरक्षण से आने वाले किसी का हक़ मारते हैं या कम काबिल होते हैं सिवाय धूर्तता के और कुछ नहीं.

आरक्षण को तमाम लोग गरीबी उन्मूलन से जोड़ते हैं. 2014 में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनने के बाद संचार के तमाम साधनों से यह तेजी से प्रसारित किया जाने लगा कि आरक्षण का लाभ गरीब लोगों को नहीं मिल रहा है. इस प्रचार में बड़े करीने से यह भी जोड़ा गया कि पिछड़े वर्गों, दलितों की कुछ जातियां आरक्षण का पूरा लाभ ले रही हैं. बाकी जातियां पीछे छूट जा रही हैं. इस तरह का प्रचार करने वालों को इसका राजनीतिक लाभ भी मिला. लेकिन आंकड़े कहते हैं कि ज्ञान, विज्ञान, तकनीकी विकास और वैचारिक धारणा बनाने वाले मुख्य केंद्र यानि भारत के विश्वविधालय में ओबीसी की संख्या 27 प्रतिशत पहुंचना तो दूर, लगभग नगण्य या कुछ मंत्रालयों में शुन्य है. ऐसे में ओबीसी की किस जाति को ताकतवर कहा जा सकता है? वह कैसी ताकतवर जाति है, जिसकी जाति का एक भी प्रोफेसर प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरु विश्वविधालय में नहीं पहुंचा? वह कैसी ताकतवर जाति है, जिस जाति का एक सचिव प्रमुख पदों पर नहीं पहुंचा, जिससे वह नीति निर्माण में भूमिका निभा सके? और अगर एससी, एसटी और ओबीसी की ताकतवर जातियां, जिन पर आरक्षण का लाभ खा जाने का आरोप लगता है ये इन पदों पर नहीं पहुँच रही हैं तो उनका हिस्सा कौन भकोस रहा है? यह सब सोचने विचारने की जरूरत है.

आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है. मंडल आयोग की रिपोर्ट पेश करते समय आयोग के अध्यक्ष बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल ने अपनी रिपोर्ट में भी यह साफ़ किया था. वह सीधे-सीधे प्रतिनिधित्व का मसला है. जिन लोगों के साथ सामाजिक और शैक्षणिक रूप से भेदभाव किया गया, उनको प्रतिनिधित्व देने के लिए आरक्षण दिया गया. प्रशासन में कुछ जातियों के एकाधिकार को ख़त्म करने के लिए आरक्षण दिया गया. जिन जातियों ने अपनी जाति को श्रेष्ठ बताकर पदों को हथियाया, जाति को चयन का आधार बनाकर सिर्फ एक ही जाति और अपने रिश्तेदारों को ही योग्य मानकर प्रशासनिक पदों पर भरना शुरू किया, उनके अवैध कब्जे व अघोषित आरक्षण को तोड़ने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया. इसलिए आरक्षण का प्रावधान किया गया, ताकि योग्य लोग प्रतियोगिता के आधार पर चुने जाएँ, न कि सिर्फ एक जाति का ही व्यक्ति प्रशासक बने. इस तरह से राष्ट्र निर्माण और जाति विशेष का प्रशासन में कब्ज़ा तोड़ने व योग्य लोगों को मौका देने के लिए सकारात्मक कार्रवाई के तहत आरक्षण का प्रावधान किया गया.

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सत्येन्द्र पीएस

सत्येन्द्र पीएस का जन्म 1975 में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले के छोटे से एक गांव ननिहाल में हुआ. उन दिनों परिस्थितियों और कुछ मजबूरियों की वजह से माता पिता बेघर थे. बाद में गोड़ा ज़िले के एक अत्यंत पिछड़े गांव अषोकवापुर में आषियाना बसाने की कवायद की, जहाँ प्राथमिक शिक्षा मिलनी शुरू हुई. बच्चों को बेहतर शिक्षा देने की माँ की ज़िद फिर गोरखपुर खींच लाई, जहाँ माध्यमिक से लेकर बीए, एमए, बीएड आदि डिग्रियां बटोरीं. गोरखपुर की रेलवे लाइब्रेरी ने ऐसा बिगाड़ा कि यूनिवर्सिटी की किताबों से हटकर इधर उधर की किताबें पढ़ने की आदत हो गई. पाठ्यक्रम व नौकरी केंद्रित पढ़ाई कभी हो ही नहीं पाई. घुमक्कड़ी और विभिन्न धरना प्रदर्शनों, गोष्ठियों, चर्चाओं की लत भी लग गई. बची खुची कसर काषी हिन्दू विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान पूरी हो गई. डेढ़ दशक से ज़्यादा समय तक विभिन्न अखबार, टीवी चैनलों की यात्रा करते हुए सत्येन्द्र पिछले एक दशक से आर्थिक पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

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